उलझन

 
बड़ी परेशानी है.......
पिछले कई सालों का हर दिन
इसी क़श्मक़श में गुज़ारा है
कि क्या कम करें,क्या ज्यादा
कि जिससे सेहत बनी रहे।

कम तेल, कम मीठा
कम चर्बी, वगैरह वगैरह...
खूब वर्जिश,खूब स्टेमिना
खूब प्रोटीन्स, वगैरह वगैरह...
एग यलो,एग व्हाइट
ये ऑइल,वो ऑइल वगैरह वगैरह...

कितनी बार लगाएँ हैं ताले
जबान पर और मन पर,
और कुचला है लालसाओं को।

इस सारी मशक्कत की
वजह बस इतनी ही है
कि चलते रहें हाथ-पैर,
मोहताज ना होना पड़े
किसी का भी, कभी भी
किसी भी बात के लिए।

और अब जैसे जैसे
उम्र खिसकने लगी है
इस किनारे से दूर,उस तरफ 
दिल में अक्सर ये खयाल
आ ही जाता है कि
ये जो इतनी मेहनत और
समझदारी भरा जीवन है
इसका अंत भी हो एकदम
साफसुथरा,फट से।
जैसे बटन दबाते ही
बंद हो जाता है खिलौना।

अब सिर्फ यमराज के
यहाँ अरज़ी है, कि भेजें 
कोई छोटा-मोटा नहीं,
बल्कि एक बिलकुल
जबरदस्त ऐसा दिल का दौरा 
कि बस पलक झपकते ही
पहूँच जाएँ इस पार से उस पार
कि अब सफर करने से
लगता है डर

तो अब परेशानी जो है..
वो बस इतनी ही है
कि कठिन अनुशासन में पले
इस तंदुरुस्त शरीर का दिल,
ये वही पुर्जा है, जिसके
रख-रखाव के लिए ही
इतने पापड बेले उम्र भर,
वो अब बंद होने की कोई वजह
आखिर लाए, तो कहाँ से लाए?

                
                                    स्वाती
                           

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