दोस्ताना-३

अलादीन और जास्मीन

एक बार हम बच्चों को ले कर खंडाला गये थे। लौटते समय लोनावला से हमने कॉकेटील की एक जोड़ी खरीदी।  उनका नाम अलादीन और जास्मीन रखा गया।

पहले भी कई बार हमने पक्षी लाने के बारे में सोचा था, लेकिन किसी आजाद परिंदे को कैद करने का विचार बड़ा भयानक लगता था।

लेकिन जिनसे पक्षी खरीदे थे उन्होंने ये कह कर हमारा हौसला बढ़ाया, कि ये तो पैदा ही पिंजरे में हुए हैं। यदि इन्हें बाहर खुला छोड़ा जाएगा, तो एक दिन भी जी नहीं सकेंगे। जब ये पक्षी हमने देखे तो मोह भी होने लगा ही था।

तुरंत उनके लिए एक बड़े से पिंजरे का बंदोबस्त किया गया। मैनें कॉकेटील पर एक किताब ढूँढ निकाली, और एकदम by the book उनका पालन पोषण शुरू हुआ।
उनके लिए सूरजमुखी के बीज, नमक / कैल्शियम के बड़े ढेले, पक्षियों के लिए मिलने वाले विशेष खिलौनें वगैरह वगैरह लाए गए।

बचपन में एक बार मैं हमारे घर के पिछले आँगन में बैठी थी। अचानक जाने कहाँ से दो सफेद कबूतर आ कर पेड़ पर बैठ गये। मैने उन्हें बुलाया तो नीचे भी आ गये। मैनें थोड़े चावल खाने को दिए। उसके बाद तो वो रोज ही आने लगे। कुछ दिनों में ही उनकी हिम्मत इतनी बढ़ गई थी कि वे मेरे हाथ से दाना खाते थे।

हालांकि वे शायद किसी के पालतू कबूतर थे, और उन्हें आदत रही होगी इंसानों की, लेकिन उन दिनों मैं अपने आप को बड़ा खास समझने लगी थी।

पक्षी जब हाथ से दाना चुगते हैं, तो वो अनुभव वाकई खास होता है। एक अजीब सी खुशी महसूस होती है।

मैं उस घटना को भूली नहीं थी, इसलिए अलादीन और जास्मीन के साथ भी दोस्ती करने के प्रयत्न शुरू कर दिए।

पहले कुछ दिन तो वे इतना डरते थे, कि पिंजरे के पास जाते ही डर के मारे चीख चीख कर फडफडाने लगते। लेकिन धीरे धीरे उन्हें हमारी आदत होने लगी। फिर मैनें पिंजरे में हाथ डाल कर उन्हें दाना खिलाना शुरू किया।

जब वो हाथ पर बैठ कर खाने लगे, तो फिर धीरे-धीरे कमरा बंद करके पिंजरा खुला भी छोड़ने लगे।


कभी कभी वो पंखे पर जा कर बैठ जाते और घंटों नीचे नहीं आते, तब उन्हें पकड़ कर पिंजरे में बंद करना अच्छा खासा सरदर्द होता। वो इतना फड़फड़ाते और चोंच मारते की बच्चे डर के मारे चीखने लगते। अच्छा खासा हंगामा हो जाता। हाथ में टॉवेल ले कर सीढ़ी पर चढ़ कर उन्हें पकड़ना पड़ता। उतनी देर में वो उड़ कर दूसरी जगह बैठ जाते। फिर सीढ़ी से उतर कर सीढ़ी हिलाने तक वे उड़ कर और कहीं बैठ जाते। एक-आध घंटे का कार्यक्रम होता यह।

लेकिन हम लोगों ने हिम्मत नहीं हारी। कोशिश करते रहे। आखिर वो इतना तो सीख ही गये कि पिंजरे का दरवाजा खोलने पर बाहर आते।
 पाँच छः साल का सागर भी बिना डरे उन्हें हाथ से दाना खिलाता। कुछ देर बंद कमरे में यहाँ वहाँ घूमते और फिर वापस पिंजरे में चले जाते।

गंदगी तो इतनी अधिक करते की पिंजरा साफ करना भी रोज का एक काम होता। पिंजरे में मैं अखबार का एक कागज बिछाती और रोज उसे बदलती।

उनके पिंजरे में कई खिलौनें थे। उनमें एक प्लास्टिक की मछली थी जिसे डोरी से बाँध कर लटकाया हुआ था। जास्मिन का वह पसंदीदा खिलौना था। दिन भर उसे चोंच मार कर खेलती रहती।

एक दिन इसी तरह खेलते-खेलते वो मछली को पकड़ कर गोल-गोल घूमने लगी। सुबह का समय था। मेरा उसकी ओर ध्यान नहीं था। अलादीन के चिल्लाने की वजह से मैनें जा कर देखा, तो उस धागे से मछली के साथ जास्मिन भी लटक हुई थी। गोल-गोल घूमते-घूमते उसने वो धागा अपने गले में लपेट लिया था।

उसकी ये हालत देख कर अलादिन डर से पागल हो रहा था। मैनें पिंजरे में हाथ डाल कर धागा तोड़ना चाहा तो अलादिन मुझ पर चोंच से वार करने लगा। जास्मिन घबरा कर और गोल गोल घूमने लगी और लगभग उस डंडे से चिपक गई जिस पर धागा बँधा था। अब कैंची से धागा काटना नामुमकिन हो गया था।

जैसे तैसे मैनें वो धागा काटा, और वह नीचे गिरी। लेकिन उस धागे का दूसरा सिरा उसकी गरदन में फंदे की तरह फँस गया था। उसकी चोंच काली नीली दिखने लगी थी और मुँह से झाग आने लगा था। उसके पँखों के कारण धागा दिखाई भी नहीं दे रहा था। दूसरी ओर अलादिन के चीखने की वजह से कुछ समझ में आना मुश्किल हो गया था।

हमारे घर में एक अलिखित नियम है। जहाँ तक हो सके घर की, बच्चों की, पक्षी, प्राणियों की सारी समस्याएँ मैं ही सुलझाती हूँ। धनंजय उस तरफ मुड़ कर देखता भी नहीं। लेकिन जब मुझे लगता है कि अब मेरे बस की बात नहीं, तभी मै उसके नाम की गुहार लगाती हूँ। वो ये मान कर ही चलता है कि जब मैं उसे बुला रही हूँ, तो निश्चित ही बात बेहद गंभीर है और बिना एक क्षण गवाँए हाज़िर हो जाता है।

जब मैनें सुबह दस बजे उसे फोन किया तो वह एक ऑपरेशन कर रहा था। हम अस्पताल में ही रहते थे। वह बीच ऑपरेशन से दौड़ता हुआ घर आया। साथ एक सर्जिकल ब्लेड भी लेता आया जिसकी धार बहुत तेज होती है।

आते ही उसने लगभग मरणासन्न जास्मिन को उठा कर वह धागा काटा जो उसकी नाजुक सी गरदन को काट कर त्वचा में घुस गया था। उसे थोड़ा पानी पिला कर वह उसी तरह दौड़ता भागता वापस चला गया।

आखिर अलादिन शांत हुआ। जास्मिन भी कुछ देर बाद उठ बैठी। दो तीन घँटों बाद वह पहले की तरह खाने खेलने लगी। लेकिन उसकी चोंच का रंग हमेशा के लिए ही काला हो गया था।

कुछ महीनों के बाद मुझे पिंजरे में एक अंडा नजर आया। हम खुशी खुशी उसमें से बच्चा निकलने का इंतजार करने लगे। बच्चे तो हर घँटे बाद देखते थे। लेकिन वो अंडा वैसे ही पड़ा-पड़ा सूख गया।

फिर उसके बारे में मैने और किताबें पढीं, इंटरनेट पर खोजा और उन्हें घोंसला बनाने के लिए एक छोटा मटका और सूखी घाँस ला कर पिंजरे में रखी। वो दोनों खुशी-खुशी दिन भर घाँस के तिनके ले कर उस मटके में जाते रहते। कुछ दिन बाद मटके में फिर कुछ अंडे नजर आए। अब सब कुछ जैसा होना चहिए वैसा ही था।

किताबी ज्ञान के हिसाब से १८ से २१ दिन में अंडे से बच्चा निकल आना चाहिए था। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

कुछ दिनों के बाद उन्होंने पुराने अंडे खुद ही मटके से बाहर धकेल दिए। मैनें उनके खाने में कैल्शियम ब

ढ़ाया। मटके में फिर दस बारह अंडे दिखाई देने लगे। हमें लगा कुछ गड़बड़ है। आखिर कितने अंडे देगी हमारी नन्हीं सी जास्मिन?

मैंने उन पर नज़र रखना शुरू किया, और एक दिन मैनें अलादिन को अंडा देते देखा।

ये देख कर मुझे बहुत धक्का लगा कि जिसे हम साल भर से नर पक्षी समझ रहे थे वो दरअसल में मादा थी।

अलादिन और जास्मिन दिखने में बिल्कुल अलग थे। उनके स्वभाव भी अलग थे। अलादिन बड़ा और ज्यादा खूबसूरत था। उसके गाल जास्मिन से ज्यादा लाल और कलगी अधिक रंगीन थी। पक्षी जगत में नर हमेशा ही मादा से अधिक सुंदर होता है, इसलिए हम उसे नर ही मान रहे थे। जिनसे उन्हें खरीदा था उन्होनें भी यही बताया था।

मजे की बात तो यह है कि इस दौरान जास्मिन का भी अंडे देना चालू था। वेटरनरी डॉक्टर से बात कर के आखिर यह नतीजा निकला कि हमारे अलादिन और जास्मिन दोनों ही मादा हैं। पक्षियों में मादा का इस तरह अंडे देना आम बात है। बस नर से संयोग ना होने के कारण यह अंडे अनफर्टिलाइज्ड ही रहते हैं। उनसे बच्चे नहीं निकलते।

तो इस तरह अंडों की तादाद बढ़ती जा रही थी। हमारे मित्र डॉ. गोरे के पास कुछ कॉकेटील थे। जिनमें से कुछ निश्चित रूप से नर थे। फिर आखिर ये तय किया गया कि हमारे पक्षी उनके पक्षियों के पास छोड़े जाएँ, ताकि वो सामान्य व्यवहार सीख सकें।

उनके सारे साजो-सामान के साथ अलादिन,जास्मिन को वहाँ छोड़ा गया।

कुछ दिन बाद जब मैं उनसे मिलने गई तो उन १०-१५ पक्षियों के बीच अलादिन तो मुझे पहचान में ही नहीं आया। अपनी काली चोंच के कारण जास्मिन मुझे दिख गई।

उनके हमें पहचानने का तो कोई सवाल ही नहीं था।

करीब १५ -२० कॉकेटील और एक छोटे कमरे जितने बड़े पिंजरे में वे काफी खुश नज़र आ रहे थे।

हमने तय किया कि वे वहीं ठीक हैं।

उसके बाद पक्षी लाने का विचार हमनें अभी तक नहीं किया है।

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हम संजीवन अस्पताल में ही रह रहे थे।
सुनने में चाहे बड़ा अजीब सा लगे, लेकिन वहाँ जीवन काफी मज़ेदार था।
अजीब अजीब घटनाएँ होती रहती थीं वहाँ।
एक दिन दोपहर को एक अधेड़ उम्र की महिला घर आईं।

उन्होंने बताया कि वे सर्पमित्र हैं। जब कहीं साँप निकलता है तो उन्हें बुलाया जाता है। वे उसे पकड़ कर सुरक्षित स्थान पर पहुँचा देती हैं, ताकि उसे मनुष्य से खतरा ना हो।
इसी तरह एक बार एक नाग को पकड़ते समय छोटा सा अपघात हो गया और नाग ने उन्हें काट लिया।

धनंजय ने उस सर्पदंश से उनके प्राण बचाए। वे पूरी तरह से ठीक हो चुकी थीं, और अपने डॉक्टर के बारे में उत्सुक्ता होने के कारण, उनके परिवार से मिलना चाहती थीं।

वे आईं, आभार प्रदर्शित किया। चाय पी। घर में कौन-कौन है, कितने बच्चे हैं वगैरह पूछताछ की।

फिर उन्होंने कहा कि वे हमारे बच्चों को कुछ भेंट देना चाहती हैं।

मैनें भी शिष्टाचार का पालन करते हुए
“नहीं-नहीं इसकी कोई ज़रूरत नहीं। आप ठीक हो गईं ये बड़ी बात है।” वगैरह कहा।

यहाँ तक तो सब ठीक था।

फिर उन्होंने अपनी पर्स की चेन खोल कर, बेहद सहजता से एक जीवित साँप निकाला, और उतनी सहजता से मानों चॉकलेट दे रही हों मुझे देने के लिए हाथ आगे बढ़ाया।
छोटा सा,करीब डेढ़ फुट लंबा हरे रंग का साँप था।

हालंकि मुझे साँप बेहद पसंद हैं और टीव्ही पर आने वाले साँपों के सारे कार्यक्रम मैं बड़े प्रेम से देखती हूँ, लेकिन इस घटना के लिए मैं मानसिक रूप से तैयार नहीं थी और मेरी चीख निकल गई।

मेरी प्रतिक्रिया देख कर वे हैरान हो गईं।

“आप किसी अशिक्षित महिला की तरह चिल्ला क्यों रहीं है? ये विष हीन है। कुछ नहीं करेगा। एकदम हानिरहित है, काट भी लिया तो कुछ नहीं होगा।”

“आप इसे पहले वापस रखिए।”

“रख लीजिए न, बच्चे खेलेंगे। उनका डर कम होगा, वे इनके महत्व को समझ सकेंगे और ...” वो समझाने की कोशिश करने लगीं।

मैं जब किसी प्रकार भी साँप रखने को तैयार नहीं हुई, तो बेहद आहत हो कर उन्होंने वापस पर्स खोली और मानों छुट्टे पैसे रख रहीं हों, इतनी सहजता से पर्स के एक कप्पे में उस बेचारे साँप को डाल लिया।

मैनें उन्हें समझाने की कोशिश की, कि मुझे डर उस साँप की सुरक्षा के लिए ही है। फिर मैने उन्हें बताया कि हमारे बच्चों के चंगुल में फँस कर एक बेचारी बिल्ली के क्या हाल हुए थे। जो प्राणी खुद की रक्षा स्वयँ कर सके वही हमारे घर रह सकता है।

तब जा कर वे मानी।

लेकिन बच्चों को आज भी इस बात का मलाल है कि उनके घर और जीवन में एक अद्भुत मित्र आते आते रह गया।


      अगली बार हमारी सबसे प्यारी दोस्त शेरी..

2 thoughts on “दोस्ताना-३

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  1. सारा नजारा आँखोंके सामने आ गया।
    Enjoyed reading it.

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