चलो,कोई तो है !

चलो,कोई तो है !

 

शास्त्रीजी सारे घर के दो चक्कर लगा चुके थे। सुमन किचन में काम कर रही थी।

आदित्य दाढ़ी बना रहा था। बच्चे स्कूल के लिए तैयार हो रहे थे।

शास्त्रीजी ने सोचा कुछ काम किया जाए।

लेकिन क्या?

जब तक पत्नी जीवित थी, तब तक तो उन्हें यही लगता था, कि घर में कुछ काम होता नहीं। औरतें बिना वजह इस कमरे से उस कमरे में घूमती रहतीं हैं ताकि लोगों को लगे, कि वे बेहद व्यस्त हैं।

और अब रिटायरमेंट के बाद जब उन्हें पता लगा कि वाकई काम तो बहुत है, तब उनकी समझ में ये नहीं आता कि वे किस काम के हैं ?

उन्होनें बहुत से कामों का विचार किया, जिनकी घर में ज़रूरत होती है। खाना बनाना, सफाई करना, सब्जी लाना, कपड़े धोना, इस्त्री करना वगैरह वगैरह….

और जल्दी ही उनकी समझ में आ गया, कि इनमें से कोई भी काम उनके बस का नहीं है। और वैसे भी हर काम के लिए कोई ना कोई कुशल व्यक्ति पहले ही घर में मौजूद है।

बागीचे में पानी पहले पत्नी दिया करती थी, अब बहू सुमन देती है।

उन्होंने बहुत जिद करके ये काम खुद करना शुरू किया था। लेकिन बहुत से पेड़ उन्हें नज़र ही नहीं आए। ऊपर नीचे, इधर-उधर जाने कहाँ-कहाँ टाँग कर रखे थे। कोई सिस्टिम ही नहीं थी। कुछ पेड़ों में पानी देना रह ही गया।

दो ही दिन में जब कई पेड़ मुरझा गये, तब सुमन नें बिना कुछ कहे, सुबह जल्दी उठ कर पौधों को पानी देना शुरू कर दिया।

वैसे वो था भी क्या? मुश्किल से आधे घंटे का काम। उसके बाद क्या?

यही तो मुसीबत है। शास्त्रीजी को यदि पेड़-पौधों से लगाव होता, बागवानी का शौक होता, तो और बात थी, लेकिन जबरदस्ती समय काटने के लिए एक ही काम और वो भी सिर्फ आधा घंटा…

फिर बाकी का दिन पड़ा ही रहता है सुस्त अजगर की तरह सामने।

पत्नी पता नहीं इतनी देर कैसे बगीचे में बिताती थी और फिर भी उस लगता था कि उसे वक्त कम मिलता है। जाने क्या करती रहती थी?

पिछले चालीस सालों में उनके अपने व्यवसायिक काम के अलावा, उनकी ज़िंदगी में किसी दूसरे शौक की जगह ही नहीं रही।

रिटायरमेंट के समय उन्होंने सोचा था कि बहुत सी अच्छी किताबें पढ़ना रह गया है। पढ़ते,पढ़ते समय कब गुज़र जाएगा पता ही नहीं चलेगा।

कई सालों से एक लिस्ट भी बन रही थी बाकायदा। जब कभी कोई किसी किताब का जिक्र करता, तो तुरंत अपनी डायरी में उसका नाम लिख लेते। कई तो खरीद भी रखीं थीं।

लेकिन अब पहली किताब ही खत्म होने का नाम नहीं ले रही।

अब चश्मा लगा कर भी इतना बारीक प्रिंट पढ़ना उनके बस की बात नहीं रही। एक पृष्ठ भी पढ़ते हैं तो सारा दिन सर में दर्द रहता है। सच तो ये है कि अब दूसरों की कहानियों में मन ही नहीं रमता।

घूमने का शौक भी वक्त के साथ ना जाने कहाँ गुम हो गया। वैसे रोज शाम को सामने वाले बगीचे में एक चक्कर लगा आते हैं।लेकिन उसे ना तो घूमना कहा जा सकता है ना ही व्यायाम। वह तो घर वालों की ज़िद है कि वे कुछ हाथ-पैर हिलाएँ।

उनका तो अब घर से बाहर निकलने का भी मन नहीं करता। जब से दूसरा हार्ट अटॅक आया है,तब से थोड़ा कॉन्फिडेंस भी कम हो गया है।

शास्त्रीजी को अचानक वह किस्सा य़ाद आया, जब वे स्कूल की पिकनिक में शिमला गये थे। रास्ते में किसी स्टेशन पर पानी लेने उतरे थे। ट्रेन चल पड़ी तो घबराहट में दूसरे ही डिब्बे में चढ़ गये थे। बहुत छोटे से थे उस समय वे। लेकिन तब भी, अब से अधिक आत्मविश्वास था।

उनकी बहुत इच्छा हुई कि यह किस्सा किसी को सुनाया जाए।

लेकिन सुबह आठ बजे, जब हर कोई जल्दी में है, तब पुराने सुने सुनाए किस्से को फिर से कौन सुनेगा?

शास्त्रीजी को याद आया, जब वे ऑफिस जाने की जल्दी में होते थे। काम की हज़ार बातें घूमती रहती थीं दिमाग में।और ऐसे में ही पत्नी या बच्चे आ कर कुछ ना कुछ बताने लगते थे। कितनी उलझन होती थी पीछा छुड़ाने में।

अच्छा-अच्छा,हाँ-हाँ, शाम को बताना करते, वे ऑफिस भागते थे। उनका समय,उनका ज़माना था वह।

अब उसी बेटे को वह ५०-६० साल पुराना किस्सा सुनाना चाहते हैं।

यही किस्सा सुनाना चाहते हैं, ऐसा नहीं है। दरअसल वे चाहते हैं कि कोई उनसे बात करे। ऐसा नहीं है कि घर में उनसे कोई बात करना नहीं चाहता। पर आज उनके जितना समय किसी के पास नहीं है। फिर वे भी तो बार बार वही पुराने किस्से दोहराते रहते हैं। सब जवान जहान कामकाजी बच्चे हैं। फुरसत ही नहीं है उन्हें।शास्त्री समझते हैं, लेकिन फिर भी…

बगीचे में उनके हम उम्र बहुत से बूढ़े होते हैं। लेकिन उनसे बात करने की शास्त्रीजी की इच्छा नहीं होती। वे सब अपनी ही हाँकते रहते हैं। दुसरे की कोई नहीं सुनना चाहता। उनकी बातों से शास्त्रीजी बड़ी जल्दी ऊब जाते हैं।

अब डॉ.प्रधान ने अमुक डिफीकल्ट केस कैसे ट्रीट किया था, या पाठक कॉलेज के छात्रों में कितने पॉप्युलर थे इससे शास्त्रीजी को क्या लेना देना?

यदि वे उन खडूसों को अपना शिमला वाला किस्सा सुनाएँ, तो निश्चित रूप से उनकी बात खत्म होने से पहले ही, कोई ना कोई ज़रूर कहेगा कि ये तो कुछ भी नहीं; एक दफा मेरे साथ क्या हुआ…

उन्होंने सामने पड़ा पेपर उठा लिया। सुबह साढ़े चार बजे से जगे हुए हैं शास्त्रीजी।

आजकल नींद भी तो कितनी कम आती है। सारी हेडलाइन्स कब की पढ़ चुके थे। फिर से पेपर के पन्ने उलटने लगे। सब बकवास भरी पड़ी है।

बच्चों का पन्ना… शायद उसमें ही कुछ पढ़ने लायक हो। लोक कथा पढ़ डाली, पहेलियाँ सुलझा डालीं, चुटकुले हँसने के लायक नहीं थे। अब क्या?

अचानक उनकी नज़र निचले कोने के एक चौकोन पर पड़ी।

पत्र-मित्र

बहुत से नाम और पते थे उसमें। साथ ही उम्र और शौक भी लिखे थे।

शास्त्रीजी को बहुत आश्चर्य हुआ। इंटरनेट के जमाने में कोई पत्र क्यों भला लिखेगा।

लेकिन यही बात आज के बच्चों को पता चले, इसलिए अखबार ने यह विशेष कॉलम शुरू किया था।

ताकि आज की पीढ़ी के बच्चों को हाथ से पत्र लिखना क्या होता है और डाकिए के इंतज़ार का मज़ा क्या होता है यह पता चल सके।

उन्होंने पढ़ना शुरू किया।

जय श्रीवास्तव, उम्र-१४, शौक-घूमना, विडिओ गेम खेलना, कुत्ते के साथ खेलना।

सोनाली मालपाठक, उम्र १४, शौक- फिल्में देखना, नाचना।

देविका सिन्हा,उम्र-१५, शौक पेंटिंग करना, दोस्त बनाना, बाते करना,घूमना।

‘बाते करना’ पर उनकी नज़र अटक गई।

उन्होंने नाम,पता,शौक सब एक बार फिर से पढ़ा।

उनके नाती पोते भी तो लगभग इसी उम्र के हैं। लेकिन बात करने का शौक किसी को नहीं है।

खास करके उनसे बात करने का तो नहीं ही है।

उन्होने आगे के दस बारह नाम और पढ़ डाले।

अंत में लिखा था कि इनमें से किसी से या सबसे कोई पत्र-मैत्री करना चाहे तो वह पत्र लिख सकता है। उसके बाद तमाम नियम थे , जिनका पत्र लेखक को पालन करना अपेक्षित था।

शास्त्रीजी की अचानक इच्छा हुई कि इस देविका सिन्हा को पत्र लिखा जाए।

अपने इस खयाल पर उन्हें खुद भी आश्चर्य हुआ।उनकी पोती अंजू की ही तो उम्र की है ये लड़की।

और लिखेंगे क्या?

बेटी देविका,

तुम्हारी उम्र की मेरी एक पोती है,जो हमेशा जल्दी में रहती है। हाय दादाजी और बाय दादाजी के सिवा उसे कुछ कहने की फुर्सत नहीं है। तुम्हें तो बात करने का शौक है।इसलिए तुम्ही इस बूढ़े की बकवास सुनो।

तुम्हारा दादाजी

या फिर ये कि बेटी, जमाना खराब है, तुम्हारे घर वालों को अक्ल नहीं है क्या, जो इस तरह तुम्हें अखबार में अपना नाम पता छापने की अनुमति दे दी।

हँसेगी वो मुझ पर। अपने सब दोस्तों को दिखाएगी ये पत्र। मज़ाक का विषय बन जाएगा उनके लिए ये पत्र।

उन्होंने अखबार तह कर के रख दिया।

टीव्ही के सत्तर चॅनल बदलते बदलते जैसे-तैसे एक बजा।

दोपहर का खाना उन्होने सुमन के साथ खाया। उस दौरान दो बार दरवाजे की घंटी बजी और तीन फोन आए।शास्त्रीजी उसे शिमला वाला किस्सा सुनाना चाहते थे,लेकिन मौका ही नहीं मिला। उन्हें याद भी नहीं आ रहा था कि पहले ये किस्सा उसे सुनाया है या नहीं। लेकिन सुनती तो उसे भी मज़ा आता।

बेटी अदिती को फोन किया। लेकिन हमेशा की तरह उसने दबी ज़बान में बताया कि वो अभी बेहद व्यस्त है। फुर्सत मिलते ही फोन करेगी।

उदास से शास्त्रीजी कमरे में आ कर लेट गये।

ज़िंदगी के पहले बीस साल उनके पढ़ने-लिखने में गुज़र गये। बाद के चालीस काम में। उनके जैसे काबिल आदमी के लिए ना तो कभी काम की कमी रही ना ही पैसे की। बस एक ही चीज़ की कमी हमेशा रही, और वह थी समय की।

एक वक्त था जब बच्चे उनकी हर कहानी सुनने को तैयार रहते थे, पर इनके पास समय नहीं था। अब उनके पास नहीं है।

शास्त्रीजी को पत्नी पर बहुत गुस्सा आने लगा। उसे भी ऐसी क्या जल्दी थी जाने की।इधर ये काम से रिटायर हुए और उधर वो दुनिया से ही चल दी।उसकी बहुत याद आने लगी। आज वो होती तो…

कितने वादे किए थे उन्होंने उससे और खुद से। रिटायरमेंट के बाद कितनी जगहें देखनी थीं। बहुत घूमना था।सारा वक्त सिर्फ उसके ही नाम करने वाले थे वो।

पहला हार्ट अटॅक आया, तब उसके बहुत जिद करने के बावजूद भी वे काम बंद नहीं कर पाए थे। हार्ट अटॅक इन्हें आया था। चल वो दी।

इस तरह उसके बेवजह जाने से शास्त्रीजी का सारा गणित ही चूक गया।

अब अकेलापन उन्हें काँटे की तरह चुभने लगा है। ना तो अब वो इतने जवान हैं कि काम का तनाव सह पाएँ और ना ही इतने बूढ़े कि बगीचे में बैठने वाले बूढ़े खूसटों को सह पाएँ।

उनकी नज़रें बार बार टेबल पर पड़े अखबार पर जा कर अटक जाती।

देविका सिन्हा; जाने कैसी होगी ये लड़की, जिसे बात करने का शौक है और जो सचमुच के कागज पर पत्र लिखती है।

अचानक उनके मन में एक विचार बिजली की तरह कौंधा। शास्त्रीजी उठे। टेबल पर से एक कागज उठाया और लिखने बैठ गये।

“प्रिय देविका,

अखबार के पत्र-मित्र वाले कॉलम से तुम्हारे बारे में पता चला। मुझे भी तुम्हारी तरह घूमने और किताबें पढ़ने का शौक है। बाते करना किसी का शौक हो सकता है ये मुझे पता नहीं था। मैं तो अब तक इसे आदत ही मानता था।

मैं अपना परिचय भी दे दूँ। मेरा नाम अभय शास्त्री है, मेरी उम्र है… ”

वे कुछ पल रुके।

“मेरी उम्र है १७ साल। क्या तुम मुझसे दोस्ती करना चाहोगी? यदि हाँ तो मुझे पत्र लिखना।”

वे बहुत कुछ लिखना चाहते थे ,लेकिन पहली बार में ही इतना अधिक लिखना ठीक नहीं, ये सोच कर उन्होंने खुद का पता लिखा और पत्र समाप्त किया।

पत्र लिफाफे में डाल कर चिपकाते समय उन्हें अजीब सी उत्तेजना हो रही थी।

अखबार में देख कर देविका सिन्हा का पता लिखा और उनका विचार बदले, इससे पहले इतनी धूप में जा कर ही पत्र पोस्ट कर आए।

उसके बाद अगले कई दिन सिर्फ पोस्टमॅन के इंतज़ार में गुज़रे।

कई दिनों बाद जब उन्हें यकीन हो चला था कि अब जवाब नहीं आएगा, तब एक दोपहर को उनके नाम का पत्र आया।

घर में सुमन के अलावा और कोई नहीं था और वो भी अपने कमरे में लेटी थी। लेकिन फिर भी शास्त्रीजी ने अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद किया, फिर पत्र खोला।

देविका सिन्हा का तीन पन्नों का लम्बा पत्र था। उन्होंने जल्दी जल्दी पढ़ना शुरू किया।उसने अपने बारे में , अपने परिवार और दोस्तों के बारे में, अपने शहर कलकत्ते के बारे में बहुत कुछ लिखा था।

कितने सालों के बाद किसी ने उन्हें पत्र लिखा था। इस तरह का पत्र तो जीवन में पहली बार ही किसी ने लिखा था। उन्हें सच में किसी सत्रह साल के लड़के की तरह आनंद होने लगा।

“प्रिय अभय”

पत्र की शुरुवात थी। उन्हें अपना नाम भी अनजाना सा लगने लगा। उन्होंने अक्षरों को उँगली से छू कर देखा।

फिर दिन भर वे देविका को मन ही मन पत्र लिखते रहे, मिटाते रहे।

उनका बहुत मन हुआ, किसी को इस पत्र के बारे में बताया जाए। लेकिन ऐसा कोई याद ही नहीं आया जिससे ये बात की जा सके। सारी दुनिया सिर्फ परिचितों से भरी है। मित्र कोई नहीं।

यदि पत्नी होती, तो क्या उससे कह पाते ये बात ? तब इसकी ज़रूरत ही ना पड़ी होती।

उन्हें अचानक हँसी आ गई। वो यदि जीवित होती और ये पत्र देखती तो उनकी धुलाई तो बाद में होती पहले तो वो टिकिट कटा कर इस देविका के घर कलकत्ते जाती और उसके ही नहीं उसके माँ बाप के भी कान खींचती कि लड़की की तरफ ध्यान नहीं है। देखो बुढ्ढे को पत्र लिख रही है।

रात को उन्होंने फिर एक बार पत्र पढ़ा, एक एक पंक़्ति, धीरे धीरे।

फिर पढ़ा। फिर फिर पढ़ा।

जब वे उसे जवाब लिखने बैठे तो उन्हें सच में ऐसा लगने लगा मानो वे सत्रह साल के ही हैं।

उन्होंने देविका को लिखा कि उन्हें घूमने का कितना शौक है। वो किस्सा भी जब शिमला वाली पिकनिक में गलत डिब्बे में चढ़ गये थे। उन्होंने ये भी लिखा कि वे एक अच्छे घर के सभ्य लड़के हैं, इसलिए ठीक है,वरना इस तरह किसी अनजान व्यक्ति को पत्र लिखना कितना गलत है।कोई उसका गलत फायदा भी उठा सकता है। उन्हें जब लगा कि पत्र लम्बा होने लगा है, तब ही उन्होंने लिखना बंद किया।

अगले पत्र में देविका ने लिखा कि उसे उनकी सोच किसी बूढ़े आदमी की तरह लगती है, जो दुनिया की हर नई चीज़ से डरता है और उसे अनुभव का नाम देता है। और ये भी कि पत्र-मित्र यह परंपरा तो बहुत सालों से चली आ रही है। उसने लिखा कि वो किसी से नहीं डरती और अभय भी उससे ना डरे। उसने अपना एक फोटो भी भेजा था। वह बहुत खूबसूरत तो नहीं थी,लेकिन उसकी आँखों में शास्त्रीजी को चमक दिखी। उन्हें वो बुद्धिमान लगी। उसने इनका भी एक फोटो मांगा था।

शास्त्रीजी ने सारे पुराने एलबम छान कर अपना एक पुराना फोटो ढूँढ निकाला, जिसमें वो लगभग सत्रह साल के थे और उनके खयाल से काफी अच्छे दिख रहे थे।बाज़ार से  उसकी एक नई कॉपी बनवाई। उसके साथ एक लम्बा पत्र भी लिखा कि जिसमें लिखा कि चूंकि वह उन्हें बूढ़ा समझ रही है इसलिए वे फोटो भी ब्लॅक एंड व्हाइट भेज रहे हैं।

देविका को उनका फोटो पसंद आया और पत्र बहुत मज़ेदार लगा। उसे लगा कि उनमें बहुत सेंस ऑफ ह्यूमर है।

पढ़ कर शास्त्रीजी बहुत हँसे।

इस पत्र-मैत्री की वजह से उन्हें जीवन में फिर मज़ा आने लगा।

कई बार जब उनके झूठ पर मन उन्हें कचोटता, तो वे अपने आप को ये समझा लेते कि ये एक निर्दोष, मासूम सा झूठ है। इससे किसी का नुकसान नहीं है। बस उनका समय अच्छा कटता है।

वे याद करते कि जब सचमुच सत्रह साल के थे तब क्या-क्या करते थे।

कुछ सच, कुछ गढ़ कर वे देविका को पत्र लिखते रहते।

जब इंजिनियरिंग की प्रवेश परीक्षा थी, तब उनकी मारे डर के बुरी हालत थी।इतना डर फिर किसी परीक्षा में नहीं लगा। कितनी उम्मीदें थी घर में सबको उनसे। शायद यही उनके डर का सबसे बड़ा कारण था।बार बार उनके पिताजी कहा करते थे कि यदि एडमिशन नहीं मिला तो अपना मूँह भी मत दिखाना।

उन्होंने तय कर रखा था कि यदि एडमिशन नहीं मिला तो घर छोड़ के चले जाएँगे। ये बात वे कभी भूल नहीं पाए और किसी को बता भी नहीं पाए कि रिजल्ट आने पर पास होने के बावजूद भी कितनी देर वे अकेले बैठ कर रोए थे।

लेकिन उन्होंने देविका को यह सब बेझिझक लिख दिया।

कोई एक… ऐसा कोई एक, जिसे दिल खोल कर दिखाया जा सके , हर आदमी की ज़िंदगी में होना बहुत ज़रूरी है।

उन्हें कभी ऐसा कोई मिला ही नहीं क्या? अक्सर आजकल वे इस बारे में सोचते हैं।

पत्नी उनके सबसे करीब थी। लेकिन उससे कभी वे इस तरह की बातें कर ही नहीं पाए।बहुत  करीबी लेकिन एक अलग ही तरह का रिश्ता था उससे।

शायद जब वह उनकी ज़िंदगी में आई ,वह समय ऐसी बातों के लिए अनुकूल ही नहीं था। उन्हें क्या लगता है या उसके दिल में क्या है,से बहुत अधिक महत्वपूर्ण बातें थीं ज़िंदगी में उस समय।

बच्चे, उनकी पढ़ाई, कॅरियर, मकान, पैसा, इन्वेस्टमेंट, नाते ,रिश्ते, सोशल कमिटमेंटस् जाने क्या क्या बेहद महत्वपूर्ण लगता था उन दिनो….

और अब… जब वो नहीं रही…

शास्त्रीजी को उसकी बहुत य़ाद आती है इन दिनों।

यदि आज वह जीवित होती तो, तो क्या उनका आपस में रिश्ता कुछ अलग होता?

या अब भी वे सिर्फ घरदार,नाती-पोतों की बातें करते होते?

उन्हें देविका को खत में लिखी बातें याद आईं। इन दिनों सच और झूठ के बीच की सीमा रेखा ही मानो खो गई है।

सच और झूठ नहीं, सच और सपनों के बीच की।

वे उसे कुछ भी लिखते रहते हैं। जो भी उनका मन चाहता है। कई बार तो पत्र लिखने पर उन्हें अपने नाती की याद आती है। जब वो तीन साल का था तब बड़ी सहजता से कहता था कि जब मैं मेरा उड़ने वाला घोड़ा लेकर आसमान में गया था ना….।

उतनी ही सहजता से शास्त्रीजी देविका को लखते हैं कि मुझे हर विषय में डिस्टिंकशन मिला है।या वो सब जो वे उस उम्र में करना चाहते हैं।

उसने उन्हें एक ग्रीटिंग कार्ड ओर तोहफा भेजा।

नहीं ‘वह कोई एक’ वह व्यक्ति नहीं हो सकता ,जो आप को बेहद करीब से जानता हो। जो आपको उसकी अपनी नज़र से देखता हो।

देविका शास्त्रीजी को उनकी ही आँखों से देखती है। वैसा, जैसा वे खुद को देखना चाहते थे,चाहते हैं। और ये उन्हें सुख देता है। खुद ही अपनी एक छवि बनाना।

पिछले दो सालों में कई बार शास्त्रीजी को अपने इस झूठ पर बेहद पश्चताप हुआ। बहुत बार उन्होंने चाहा कि पत्र लिखना बंद कर दें। सच लिखने का तो सवाल ही नहीं उठता।

फिर उन्होंने यह मान लिया कि ये एक हार्मलेस झूठ है। वैसे भी वो कभी इस देविका से मिलने तो वाले हैं नहीं। और फिर वे तो उसे हमेशा अच्छी नसीहतें ही देते हैं। उसका भला चाहते हैं।

देवका की चिट्ठियाँ कुछ कम आती हैं आजकल। लेकिन शास्त्रीजी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।वे लिखते रहते हैं। कुछ सच, कुछ झूठ। कभी-कभी तो उन्हें खुद का लिखा पत्र ही इतना अच्छा लगता है कि वे उसे कई बार पढ़ते हैं। अपने ही कुछ पत्रों की तो उन्होने कॉपी भी करा के रखी ली है।

उस रोज देविका की बहुत दिनों के बाद चिट्ठी आई। पढ़ कर शास्त्रीजी कुछ अनमने से हो गये। उसने लिखा था कि उसे किसी उत्पल सेनगुप्ता से प्रेम हो गया है। यह खबर वह सबसे पहले उन्हें ही दे रही थी।

उसने यह भी लिखा था कि अब वह पहले जितनी नियमितता से पत्र नहीं लिख पाएगी, क्योंकि उसकी परीक्षा निकट है और उत्पल कहता है कि उसे अब पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।

और यह भी कि उत्पल को उनके पत्र देख कर बहुत आश्चर्य होता है कि कोई इतने लम्बे पत्र कैसे लिख सकता है।

शास्त्रीजी को उस अनदेखी देविका के अनदेखे उत्पल पर बहुत गुस्सा आने लगा। उनके पत्र वह भी पढ़ता है यह उन्हें अच्छा नहीं लगा।

देविका ने पहले भी कई पत्रों में उसका ज़िक्र किया था शायद। तब उनका ध्यान नहीं गया था उस ओर।

शास्त्रीजी उसकी सारी चिट्ठियाँ निकाल कर बैठ गये।

बाहर दरवाजे की घंटी बजी। अदिती की आवाज सुन कर वे बाहर आए। बेटी पहले से ही उनकी कुछ अधिक लाड़ली थी। आजकल तो कुछ कम ही आ पाती है उनसे मिलने। उसे देख कर शास्त्रीजी सब भूल गये।

गप्पों के बीच नाश्ता हुआ।। इस दौरान दो बार उन्होंने गलती से अदिती को देविका कहा। जब उसने पूछा कि यह देविका कौन है, तो वे सफाई से बात टाल गये।

उन्होंने तय किया कि खाने में बेटी की पसंद की मिठाई लेकर आएँगे। घर से बाहर निकल कर गाड़ी स्टार्ट कर ही रहे थे कि अचानक अदिती ने आवाज लगाई। उसे पुराने एलबम देखने थे।

गेट से बाहर निकलते-निकलते शास्त्रीजी ने बताया कि सारे एलबम उनकी अलमारी की निचली दराज में हैं।

कुछ देर के बाद अचानक ही उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।

देविका के सारे पत्र वे वैसे ही पलंग पर छोड़ आए थे। तुरंत वापस जाने का उन्हें साहस नहीं हुआ।

बेटी को वे जानते हैं। उसकी नज़रों से कुछ नहीं छुपता। और हर बात का बतंगड़ बनाना उसका शौक है।

मन ही मन तरह तरह की कहानियाँ गढ़ते हुए घर पहूँचे तो उन्हें सचमुच घबराहट हो रही थी। कितना भी हानिरहित हुआ तब भी झूठ तो झूठ ही है।

उनसे किसी ने कुछ नहीं कहा ,लेकिन सबके चेहरों पर तनाव था। सभी उनसे नज़रें चुरा रहे थे। उन्होंने सोच रखा था कि जैसे ही अदिती कुछ पूछेगी वे अपनी सफाई में क्या-क्या दलीलें देंगे। लेकिन वो कुछ बोली ही नहीं।

उनके कमरे से पत्रों की फाईल गायब थी इसलिए शक की भी कोई गुंजाईश नहीं थी।

रात तक वे खुद को बेहद दोषी महसूस करने लगे। आखिर कमरे में बैठना जब असहनीय हो गया, तब उन्होंने सोचा कि खुद ही जाकर सबको सच बता दें। बाहर निकले तो आदित्य के कमरे से आवाजें आ रहीं थीं।

वे बाहर रुक कर सुनने लगे।

“सब हमारी ही गलती है। मम्मी के जाने के बाद पापाजी बहुत अकेले हो गये हैं।” सुमन बोली।

“लेकिन फिर भी १७ साल की लड़की के साथ अफेयर? अंजू से भी छोटी है वो लड़की।” आदित्य हताश स्वर में बोला।

“पुलिस पकड़ लेगी उनको।मैने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरे अपने पिता इतनी गिरी हुई हरकत करेंगे।” ये उनकी अपनी लाड़ली के उद्गार थे।

“ ये सब पागल तो नहीं हो गये हैं। क्या बकवास कर रहे हैं। अफेयर, पुलिस?” शास्त्रीजी सकते में आ गये।

“मैनें कई बार तुम लोगों से कहा था कि वे अचानक बहुत बदल गये हैं, लेकिन किसीने ध्यान नहीं दिया। वे सचमुच ऐसे कोई बदमाश या लंपट नहीं हैं। तुम्हारे पिता हैं ,लेकिन मैं भी पिछले बीस सालों से रह रही हूँ उनके साथ। वो एक बहुत भले आदमी हैं। बस मुझे लगता है कि उन्हें थोड़ी मदद की ज़रूरत है।” सुमन बोली।

अपनी सगी औलादों से तो यह पराई बेटी भली। शास्त्रीजी ने रुकी हुई साँस फिर चलने लगी।

“पापा कभी सायकेट्रिस्ट के पास जाने को राजी नहीं होंगे”

“लेकिन उन्हें बताने की क्या ज़रूरत है कि हम उन्हें सायकेट्रिस्ट को दिखा रहे हैं। मैं कहूँगा मेरा दोस्त है। बाकी वह सम्हाल लेगा। उन लोगों को तो आदत होती है ऐसी बातों की। फीस कुछ अधिक माँगेगा और क्या। लेकिन मामला भी तो गंभीर है। और अभी मुझे दूसरा कोई उपाय भी नहीं सूझ रहा”

“तुम लोग खुद ही उनसे बात करके क्यों नहीं देखते पहले?” सुमन बोली।

“नहीं, मैं कुछ ऐसा बोल जाऊँगा कि जिसके लिए ज़िंदगी भर सबको अफसोस होगा” बेटा बोला।

“मुझे तो खुद ही किसी डॉक्टर की जरूरत है शायद। मेरा ब्लडप्रेशर बढ़ रहा है।और वैसे भी द ग्रेट अभय शास्त्री ने कब किस की सुनी है। मनमानी ही तो करते रहे हैं उम्र भर। अच्छा हुआ माँ चली गई…” अदिती बोलती ही जा रही थी।

हक्के-बक्के से शास्त्रीजी वापस अपने कमरे में आ गये। काश अभी इसी वक्त वो आखरी हार्ट अटॅक आ जाता जिसका जाने कब से इंतज़ार है।

सायकेट्रिस्ट? ये लोग क्या उन्हें पागल समझ रहे हैं?

सारी रात उन्हें नींद नहीं आई।उन्हें ज़रा भी नहीं लग रहा था कि उनसे कोई बहुत बड़ा पाप हुआ है। एक मासूम सा झूठ बस! उनके पास हर बात का जवाब है, लेकिन कोई उनसे कुछ पूछे तो। कोई बात तो करे।

सुबह घर का वातावरण आश्चर्यजनक रूप से सामान्य था। हालंकि शास्त्रीजी को सब नाटक करते से लगे। अदिती बिना उनसे कुछ कहे ही जा चुकी थी।बाकी सब हमेशा की तरह अपने अपने कामों में व्यस्त थे।

शास्त्रीजी को घुटन सी होने लगी। बार बार लगता काश, आज वह जीवित होती तो उससे ही कितना कुछ कहते।

दोपहर को आदित्य ने उन्हें आवाज दी तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। फिर जब वह बुलाने ही आ गया तो उन्हें बाहर आना ही पड़ा।

बाहर बैठे मेहमान से आदित्य ने उनका परिचय अपना मित्र कह कर करवाया। यदि उन्हें पहले ही मालूम ना होता तो वे कभी अंदाजा ही न लगा पाते कि वह मनोचिकित्सक है।

पहली नज़र में ही उसका प्रसन्न चेहरा शास्त्रीजी को भा गया। आदित्य ने ऐसा जताया कि उसे अचानक ही ऑफिस का कुछ काम आ पड़ा है इसलिए उसे जाना पड़ा, पर उसके उस तथाकथित मित्र के साथ शास्त्रीजी किसी पुराने मित्र की तरह गप्पे लगाते रहे।

अगले हफ्ते फिर मिलने का वादा करके जब वह गया, तो शास्त्रीजी को वाकई अफसोस हुआ।

उसके जाने के बाद सारा दिन शास्त्रीजी अपने और परिस्थितियों के बारे में  ठंडे दिमाग से सोचते रहे।

अब उन्हें अपने बच्चों पर और यहाँ तक कि उत्पल सेनगुप्ता पर भी गुस्सा नहीं आ रहा था। देविका भी भला कब तक पत्र लिखेगी। उसकी अपनी ज़िंदगी है, अपना भविष्य है।

उनके बच्चे भले ही अपने तरीके से आज उनकी मदद करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनका अकेलापन बाँटना किसी को भी संभव नहीं है। कुछ दिन यदि वे ज़िम्मेदारी समझ कर कोशिश भी करें तो भी सबकी अपनी अपनी ज़िंदगी है। जवानी कितने कम समय की होती है ये क्या वे खुद अनुभव से जानते नहीं? वैसे ही इस कल वाली घटना की वजह से सबका कितना दिमाग और समय खर्च हुआ है ये क्या वे समझ नहीं सकते?

वे, जो जीवन भर अपने इन्हीं गुणों की वजह से हमेशा जाने जाते रहे हैं कि वे किसी भी समस्या के बारे में ठंडे दिमाग से सोच सकते हैं और हमेशा लीग हट कर उन पर उपाय खोज पाते हैं। यही तो उनकी ताकत थी हमेशा ।

और अचानक ही उनके मन में बिजली की तरह एक विचार कौंधा।

वे कोई ऐसा व्यक्ति ही तो चाहते थे ना कि जो उनकी बात दिलचस्पी से सुने या कम से कम उनके सामने ऐसा दिखाए तो। जो उन्हें वक्त दे सके।

तो फिर उस सायकेट्रिस्ट से अच्छा व्यक्ति उन्हें कौन मिलेगा?

देविका से तो वह पत्रों के ज़रिए बात करते थे। यहाँ तो जीता जागता आदमी सामने बैठ कर सुनेगा। सुनना ही पड़ेगा उसे। आखिर उनका बेटा फीस दे रहा है उसे। यदि ठीक लगा तो वे उसे हफ्ते में दो बार भी बुला लेंगे। पैसे वो खुद दे देंगे। आखिर उनकी कमाई माया कुछ तो उनके काम आए।

वो ऐसा जताएँगे मानो उन्हें कुछ पता नहीं। लेकिन फिर एक नया झूठ?

नहीं, ऐसा हो भी तो सकता है ना जैसा बच्चे समझ रहें हैं कि उनका दिमाग सच में सठिया गया हो और उन्हें सच में मदद की ज़रूरत हो।ये सोच कर उन्हें बड़ी राहत मिली।

चलो कोई तो है। सायकेट्रिस्ट  तो सायकेट्रिस्ट  ही सही।

शास्त्रीजी उत्साह से शाम को घूमने निकल पड़े।

चलते चलते यही सोच रहे थे कि सायकेट्रिस्ट से अगली मीटिंग में क्या क्या बातें करेंगे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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