क़तरा क़तरा

जाने कैसा पिघल रहा दिल  घुलता है क़तरा क़तरा  वक़्त ए रुख़सत उलझ गया फिर अब भी समझे ना ख़तरा। सपनों को तो समझ नहीं है  मदहोशी सा आलम है  दीवारों पर धूप है लेकिन  आंगन में चंदा उतरा। कितनी बातें कितने किस्से कहना सुनना बाकी है। लेकिन हर एक पल पर जैसे लगा हुआ... Continue Reading →

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