सुबह सवरे मूँह अंधेरे हर दिन उठना, चुप-चुप गुप-चुप हौले-हौले बेआवाज पका कर खाना डिब्बे भरना किसकी खातिर ? इसकी उसकी फरमाईशों को पूरा करना दिन भर खपना, फिर भी डरना, इसके उसके ताने सुनना किसकी खातिर? इसकी जल्दी उसकी जल्दी इसकी जरूरत उसकी जरूरत बाकी सबकी भागदौड़ में, खुद को सबसे पीछे धरना किसकी... Continue Reading →
सतह के नीचे
जब हॉस्पिटल में काम करती थी, तब लोग आ कर मुझे अपनी निजी जिंदगी की जाने क्या क्या बातें बताते। मेरी रातों की नींद उड़ जाती। फिर लगता , कि ये तो शायद बताने लायक था, लेकिन इसके अलावा भी जाने क्या-क्या होगा हर एक की ज़िंदगी में, जो अब कभी भी किसी को भी... Continue Reading →
बनते बनते
ना जाने कहाँ से अचानक किसी सधे हुए शिकारी बिल्ले की तरह, एक विचार झपटा। शब्दों के चूहों में भगदड़ मच गई। कुछ को उसने उठाया, कुछ को पटका, किसी के साथ कुछ देर खेला, किसी को तेज़ नाखूनों से खरोंच कर लहुलुहान कर दिया। और फिर बिना कुछ लिए, बिना कुछ किए, जिस तरह... Continue Reading →