धीरे से एक आँख खोल कर कभी इधर देखती हूँ तो कभी दूसरी खोल कर उधर चारों ओर समाधिस्थ बुद्ध की प्रतिमाओं की तरह निश्चल, ध्यानमग्न बैठे हैं लोग। एक मैं ही हूँ इनमें शायद जिसे प्रकाश की कोई किरण दिखती ही नहीं। फिर आँख के एक कोने से दिखती है मुझे हलचल हल्की सी।... Continue Reading →
ये घर, वो घर
मेरे घर की हर चीज में मेरा ही प्रतिबिम्ब दिखता है कहता है मेरा बेटा! सच भी है। इस घर की हर छोटी बड़ी चीज में, दीवार पर लटकी तस्वीर से लेकर गमले में लगे मोगरे तक, पूजा घर के भगवान से ले कर, खिड़की पर टँगी कांच की घण्टियों तक, मानो हर बात में... Continue Reading →
सविनय अनुरोध
किसी ने कहा “तुम्हें देख कर लगता ही नहीं कि तुम इतने बड़े बड़े लड़कों की माँ हो।” इसे मैं अपनी तारीफ समझूँ या अपमान? औरतों की उम्र नहीं पूछनी चाहिए। क्यों भला? क्या ये भी मासिक की तरह कोई लज्जास्पद विषय है कि चाहे वो हर महीने झेलना पड़े पर उसकी खुलेआम चर्चा नहीं... Continue Reading →
स्वतंत्र अभिव्यक्ति
छोटी बड़ी खुशियाँ, आते जाते गम परेशानियाँ, राहतें, चाहतें, सपने दोस्त, दुश्मन, पराए, अपने सब हैं मेरे साथ हमेशा। मेरी यादों में रचे बसे। ये यादें हीं तो मैं हूँ मेरा ही हिस्सा हैं ये यादें। वो कि जब सहेली,चाय और बातों के साथ ना जाने कितने पकौड़े ना जाने कहाँ गये थे। वो कि... Continue Reading →
जाने भी दो
एक ख्याल था जो शाम से ज़हन में चल रहा था बड़ी बेसब्री से कविता बनने को मचल रहा था सोचा था कि बस घर पहुंचते ही लिख डालूंगी हाथों से छूट जाए इसके पहले किसी शक्ल में ढालूंगी घर पहुंचते ही शुरू हो गया कपड़े, बर्तन, खाने का फेर और कविता बेचारी हो गई दरवाजे... Continue Reading →
मुलाकात
कल मिला पर कुछ नहीं कहा उसने। मौसम, बारिश, दुनियादारी सबकी बातें हुईं फिर मुस्कुरा कर , हाथ हिला कर अपनी अपनी राह चले हम। पर उसकी यहाँ से वहाँ तक फैली मुस्कुराहट, ना उसकी आँखों तक पहुँची ना मेरे दिल तक। बज रही है उसकी खामोशी किसी अनावृत्त सत्य की तरह अब भी मेरे कानों... Continue Reading →
ग़लतफ़हमी
ना जाने कब ,किसने, बस यूँ ही कह दिया कि ये जीवन क्षणभंगुर है । तब से इस बात पर सारी मानव जाति आँख मूंद कर विश्वास करती चली आ रही है । अनगिनत पल, दिन, महीने, साल जी- जी के घिस गए । जीते-जीते पुराने हो चुके लोग, जर्जर अवस्था में ,इसी डर... Continue Reading →
शादी
( Jacques Prevert की फ्रेंच कविता ‘pour toi mon Amour’ से रुपांतरित) कोई बहुत पुरानी नहीं बस, कुछ ही दिन पहले की बात है । हम पहली बार मिले थे। तुमने दिये थे फूल मुझे, और कहा था... तुम्हारे लिये प्रिये कि तुम फूलों सी नाज़ुक हो। कोई बहुत पुरानी नहीं... Continue Reading →
गमन
पप्पा इतने अधिक अस्तित्वमय थे,इतने अधिक ज़िंदा थे कि जाने के बाद भी बहुत सारे रह गये। पहली बार जब उनके कॅन्सर के बार में पता चला, तब से ले कर उनके जाने तक अलग-अलग समय पर अलग-अलग मन:स्थितियों में ये चार कविताएँ लिखीं थी। पहली तब, जब उनका जाना तय है, ये पता... Continue Reading →
बुढ़िया और चोर
बच्चे जब छोटे थे, तब उनके लिए बहुत सी कविताएँ और कहानियाँ लिखीं थी। कई कहानियों के हीरो वे ही होते, और बहुत सी कविताओं में उनका नाम होता। उन्हें बहुत मज़ा आता। बार-बार अपनी ही कहानी सुनना चाहते। खुद की कविताएँ भी उन्हें ज़बानी य़ाद थीं। तब की ही कुछ कविताएँ, जो उन्हें बेहद... Continue Reading →